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March 2, 2026
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धर्म

सावन में कब है मंगला गौरी व्रत, महिलाओं के लिए क्यों है खास?

हिन्दू धर्म में भगवान शिव को समर्पित सावन का महीना 22 जुलाई दिन सोमवार से शुरू होने जा रहा है. सोमवार को भगवान शिव के निमित्त व्रत रख उनका पूजन किया जाएगा. तो वहीं सावन माह के पहले मंगलवार का भी विशेष महत्व है. यह दिन मां पार्वती को समर्पित है. महिलाएं इस दिन मंगला गौरी का व्रत रखती है.इस बार सावन के पहले दिन भोलेनाथ और दूसरे गौरी माता की पूजा विधि विधान से की जाएगी.

मंगला गौरी व्रत की शुरुआत सावन शुरू होने के अगले दिन यानी 23 जुलाई से होगी. इस दिन पहला मंगला गौरी व्रत रखा जाएगा. इसके बाद 30 जुलाई को दूसरा, 6 अगस्त को दूसरा और 13 अगस्त को चौथा और आखिरी मंगला गौरी व्रत रखा जाएगा. इन सभी दिनों पर मां पार्वती की विशेष पूजा की जाएगी. सुहागिन महिलाएं जहां अखंड सौभाग्य की कामना के लिए यह व्रत रखती हैं, तो वहीं कुंवारी युवतियां अच्छे वर की कामना के साथ यह व्रत करती हैं. जिससे सभी कामना जल्दी पूरी हो सके.

मंगला गौरी पूजा विधि

  • सबसे पहले सावन में मंगलवार के दिन सुबह जल्दी उठें और स्नानादि करके स्वच्छ कपड़े पहनें.
  • फिर एक साफ लकड़ी की चौकी पर लाल रंग का वस्त्र बिछाएं और उस पर मां गौरी की प्रतिमा स्थापित करें.
  • फिर मां मंगला गौरी के समक्ष व्रत का संकल्प करें और आटे से बना हुआ दीपक जलाएं.
  • इसके बाद धूप, नैवेद्य, फल-फूल आदि से मां मंगला गौरी की पूजा करें.
  • पूजा संपन्न होने के बाद मां गौरी की आरती करें और उनसे सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें.
  • सुहागिनों को श्रृंगार दान करना इस दिन काफी शुभ माना जाता है.

मंगला गौरी व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के महीने में मंगला गौरी व्रत रखने से वैवाहिक जीवन में चल रही समस्याओं का भी निवारण होता है. वहीं कुंवारी कन्याएं भी मनचाहे वर के लिए यह उपवास रखती हैं. इस बार सावन माह में चार बार मंगला गौरी व्रत रखा जाएगा. ऐसे में व्रती महिलाएं मंगला गौरी व्रत कथा को जरूर सुनें या पढ़ें. इसके बिना यह व्रत अधूरा माना जाता है. मंगला गौरी व्रत रखने वाली महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान मिलता है. इसके साथ ही संतान प्राप्ति में आ रही मुश्किलें दूर हो जाती हैं और संतान की रक्षा भी होती है. संतान की नजर या नकारात्मक शक्ति से बचाव होता है.

मंगला गौरी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में धर्मपाल नामक एक सेठ था, उसके पास धन संपत्ति की कोई कमी नहीं थी. वह स्वयं सर्व गुण संपन्न था. देवों के देव महादेव का भक्त था. कालांतर में सेठ धर्मपाल की शादी गुणवान वधू से हुई. हालांकि, विवाह के बाद कई वर्षों तक संतान की प्राप्ति नहीं हुई. इससे सेठ चिंतित रहने लगा. वह सोचने लगा कि अगर संतान नहीं हुई, तो उसके कारोबार का कौन उत्तराधिकारी होगा? एक दिन सेठ धर्मपाल की पत्नी ने संतान के संबंध में किसी प्रकांड पंडित से संपर्क करने की सलाह दी. पत्नी के वचनानुसार, सेठ नगर के सबसे प्रसिद्ध पंडित के पास जाकर मिले. उस समय गुरु ने सेठ दंपत्ति को भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-उपासना करने की सलाह दी.

कालांतर में सेठ धर्मपाल की पत्नी ने विधि विधान से महादेव और माता पार्वती की पूजा-उपासना की. सेठ धर्मपाल की पत्नी की कठिन भक्ति से प्रसन्न होकर एक दिन माता पार्वती प्रकट होकर बोली- हे देवी! तुम्हारी भक्ति से मैं अति प्रसन्न हूं, जो वर मांगना चाहते हो! मांगो. तुम्हारी हर मनोकामना अवश्य पूरी होगी. उस समय सेठ धर्मपाल की पत्नी ने संतान प्राप्ति की कामना की. माता पार्वती ने संतान प्राप्ति का वरदान दिया. हालांकि, संतान अल्पायु था.

एक वर्ष पश्चात, धर्मपाल की पत्नी ने पुत्र को जन्म दिया. जब पुत्र का नामकरण किया गया, तो उस समय धर्मपाल ने माता पार्वती के वचन से ज्योतिष को अवगत कराया. तब ज्योतिष ने सेठ धर्मपाल को पुत्र की शादी मंगला गौरी व्रत करने वाली कन्या से करने की सलाह दी. ज्योतिष के वचनानुसार, सेठ धर्मपाल ने अपने पुत्र की शादी मंगला गौरी व्रत करने वाली कन्या से की. कन्या के पुण्य प्रताप से धर्मपाल का पुत्र मृत्यु पाश से मुक्त हो गया.

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